Monday, December 16, 2013

Low budget Filmmaking - लघुबजट फिल्ममेकिंग


नमस्ते दोस्तों, सिनेमा समाज का आइना होती हैं, लोग इससे भावनात्मक तरीके से भी जुड़े हुए हैं. आज दुनिया भर में हजारों फिल्में बन रही हैं. भारत में स्वर्गीय श्री दादा साहेब फाल्के सिनेमा के जनक हैं, जिन्होंने पहली फिल्म “राजा हरीशचंद्र”(1913) बनाई I

हिन्दी सिनेमा, जिसे बॉलीवुड  के नाम से भी जाना जाता है, हिन्दी भाषा में फ़िल्म बनाने का उद्योग है । बॉलीवुड नाम अंग्रेज़ी सिनेमा उद्योग हॉलिवुड के तर्ज़ पर रखा गया है । हिन्दी फ़िल्म उद्योग मुख्यतः मुम्बई  शहर में बसा है । ये फ़िल्में हिन्दुस्तान, पाकिस्तान और दुनिया के कई देशों के लोगों के दिलों की धड़कन हैं । हर फ़िल्म में कई संगीतमय गाने होते हैं । इन फ़िल्मों में हिन्दी की "हिन्दुस्तानी" शैली का चलन है । हिन्दी और उर्दू (खड़ीबोली) के साथ साथ अवधी, बम्बइया हिन्दी, भोजपुरी, राजस्थानी जैसी बोलियाँ भी संवाद और गानों मे उपयुक्त होते हैं । प्यार, देशभक्ति, परिवार, अपराध, भय, इत्यादि मुख्य विषय होते हैं।

वही दूसरी तरफ अंग्रेजी सिनेमा उद्योग हैं जो हॉलिवुड के नाम से जाना जाता हैं. यह अमेरिका के लॉस एंजेलिस, कैलीफोर्निया में बसा हैं. हॉलिवुड फिल्मे लगभग पूरी दुनिया भर में देखी और सराही जाती हैं, साइंस फिक्सन, एक्शन, युद्ध, रोमांस, डिजास्टर, इत्यादि इसके मुख्य विषय होते हैं, भारत में यह हिंदी, तमिल, तेलेगु, इत्यादि में डब करके दिखाई जाती हैं.

सवाल है फिल्म निर्माण...क्या कोई छोटे से बजट में फिल्म बना सकता हैं. इसका जवाब हैं हाँ क्यों नहीं..

यदि हम कुछ बड़ी बजट के फिल्मो पर नजर डाले तो हॉलिवुड के प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक जेम्स कैमरान की  Avatar (2009) कुल बजट करीब $240 Million, Titanic (1997) $200 Million, इत्यादि. वही कुछ छोटे बजट ( Low Budget) की फिल्मो को देखे तो      Tare Zameen Par (2007) Rs.120 million (US$1.8 million), Sholay (1975) Rs. 20 million इत्यादि. कुछ सुक्ष्म बजट ( Micro Budget ) जैसे रोबर्ट रोड्रिग्स की  El Mariachi (1992) $7,000, विश्व के महानतम फिल्म निर्देशक  सत्यजीत रे की अपुश्रृखला (Apu Trilogy ) जो की विश्व की महानतम फिल्मो में शामिल हैं, इसकी पहली फिल्म Pather Panchali (1955) सिर्फ Rs. 1.5 lakh ($3000) में बनाई गयी हैं. वही उनकी Shatranj Ke Khilari (1977) भी  Rs. 20 lakh ($40,000) में बनी हैं. जैसा की हमने कुछ फिल्मो के बजट को देखा इससे हम यह कह सकते हैं की छोटे बजट में भी अच्छी फिल्मे बनाई जा सकती हैं.

किसी भी फिल्म की आत्मा उसकी कहानी होती हैं. फिल्म का बजट, उसका हिट, फ्लॉप होना उसकी कहानी- पटकथा पर ही निर्भर हैं. यदि हम बीच के कुछ वर्षो में आयी फिल्मो पर नजर डाले तो कई बड़े बजट की फिल्मे अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाई वही कुछ छोटी बजट की फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर अच्छा प्रदर्शन किया, इसका मुख्य कारण था उसकी कहानी. यदि आपको कोई कम बजट की फिल्म बनानी हैं तो कहानी ऐसी चुने जिसमे ज्यादा किरदार, लोकेशन, एक्शन ना हो, फिल्मो में जहाँ तक हो सके दूर के लोकेशन ना हो, रात की शूटींग से बचे क्योकि लाइटिंग बजट का बोझ बढ़ाएगी.

यह एक फ़िल्म के उदहारण से समझा जा सकता हैं. सन 1969 में यश चोपड़ा द्वारा निर्देशित "Ittefaq" जो की एक ब्रिटिश फिल्म Signpost to Murder (1965) की Remake थी, इस फिल्म के कलाकार थे राजेश खन्ना, नंदा, बिंदु, सुजीत कुमार, मदन पूरी, इफ़्तेख़ार. यह अपने ज़माने की पहली बॉलीवुड फिल्म थी जिसमे कोई भी गीत नहीं था. यह सिर्फ 1 घंटे 45 मिनट लम्बी थी. पूरी फिल्म की कहानी पागलखाने से अपनी पत्नी की हत्या के आरोप में फरार हुए दिलीप रॉय (राजेश खन्ना ) जो रेखा (नंदा) को बंदूक की नोख पर उसके घर में शरण लेते हैं, सिर्फ एक ही घर, एक ही रात और कुछ ही कलाकारों के इर्द गिर्द घुमती हैं, यह फिल्म हिट रही और इसके लिए यश चोपड़ा को सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का फिल्मफेयर अवार्ड मिला.    

   
      

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